Friday, June 10, 2011

दो बूँदें

( लघुकथा )

दो बूँदें मुक्ताकाश में विचरण करती हुईं पुष्प पाँखुरी पर स्थित थीं। पवन ने उन्हें देखा और पहली बूँद से निवेदन किया कि वह उसे समुद्र ( वारिधि ) तक पहुँचा सकती है। बूँद ने कुछ सोचा और एक पुराने कवि की ये पंक्तियाँ उसे याद आ गईं, वह बोली-

    "जैहै बनि बिगरि न वारिधता वारिधि की
    बूँदता विलैहै बूँद विवस विचारी की…।"

उसने सागर में विलय की अनिच्छा विनम्रता से प्रकट कर अपने स्वाभिमानी होने का बोध करा दिया।

पवन ने दूसरी बूँद से वही अनुरोध किया। यह भी कहा कि समुद्र ने ही उससे ऐसा करने के लिये कहा है। पवन का अनुरोध सुन दूसरी बूँद का भी स्वाभिमान जाग उठा और उसने भी एक आधुनिक कवि की पंक्तियों का सहारा लेकर अपने मन की बात कह डाली-

    "कह देना ! समन्दर से, हम ओस के मोती हैं
    दरिया की तरह तुझसे, मिलने नहीं आएँगें ।"

पवन बेचारा दूसरी बूँद का यह उत्तार सुनकर हक्का-बक्का रह गया।

इस पूरे दास्तान को झाड़ी में छिपा एक जुगुनू बड़े ध्यान से सुन रहा था। वह सोचने लगा, "कितनी स्वाभिमानिनी हैं दोनों बूँदें…मगर समुद्र में न मिलने की बात दोनों ने कितने अलग-अलग ढँग से कही है। एक में विनम्रता है और दूसरी में अहंकार…दोनों स्वाभिमानी हैं फिर भी दोनों में इतना अन्तर आखिर क्यों?…क्या अवस्था का अन्तर है…? परिवेश का अन्तर है…? संस्कृति का अन्तर है…? पीढ़ी अन्तराल है…? या कुछ और कारण है…?"

जुगुनू बेचारा देर तक यही सोचता रह गया।


-डा० जगदीश व्योम

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